जगराता में पितृ पूजा की विधि इस प्रकार है:
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1. तैयारी:
जगराता शुरू होने से पहले, घर को साफ करें और गंगाजल छिड़कें।
एक चौकी (लकड़ी का मंच) पर पीला कपड़ा बिछाएं।
चावलों की ढेरी पर एक दीपक जलाएं।
पितरों की पसंदीदा चीजें जैसे कि फूल, फल, मिठाई, आदि रखें।
श्राद्ध के लिए आवश्यक सामग्री जैसे कि सिंदूर, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, कपूर, जनेऊ, हल्दी, घी, शहद, काला तिल, तुलसी, पान के पत्ते, जौ, गुड़, दीया, अगरबत्ती, दही, गंगाजल, केला, सफेद फूल, उड़द दाल, मूंग, ईख, कुशा, धुर्वा, गाय का कच्चा दूध, आदि जुटाएं।
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2. पितृ आवाहन:
हाथ में अक्षत (चावल) लेकर पितरों का आवाहन करें।
आप पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए उनका आवाहन कर सकते हैं।
पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करें।
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3. षोडशोपचार पूजन:
पितरों का षोडशोपचार पूजन करें।
इसमें 16 प्रकार की उपचार विधियां शामिल हैं, जैसे कि आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा, आरती और प्रदक्षिणा।
प्रत्येक उपचार के साथ पितरों के मंत्रों का जाप करें।
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4. तर्पण:
जल, फूल और गंगाजल से भरा पात्र लें।
स्वयं को पवित्री करें।
आचार्य द्वारा सुझाए गए मंत्र से जल लेकर तर्पण करें।
मन ही मन देवताओं और पूर्वजों का आह्वान करें।
शंख, फल, फूल, अक्षत और जल लेकर संबंधित मंत्र से अर्घ्य दें।
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5. ब्राह्मण भोजन:
श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना शुभ माना जाता है।
ब्राह्मणों को निमंत्रण दें और उनके पैर धोकर उनका सम्मान करें।
ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा दें।
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6. दान:
पितृ पक्ष में दान करना भी महत्वपूर्ण है।
असहाय लोगों की मदद करें।
गरीबों को भोजन कराएं।
किसी धार्मिक स्थान पर दान करें।
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7. विसर्जन:
पूजा समाप्त होने के बाद, पितरों को विसर्जित करें।
पितरों के नाम पर जलाया गया दीपक, कुशा, आदि को नदी में प्रवाहित करें।
शेष सामग्री को अपने घर में उपयोग करें।
पितृ पूजा के दौरान कुछ महत्वपूर्ण बातें:
दक्षिण दिशा:
पितृ पूजा में दक्षिण दिशा का विशेष महत्व है।
पितरों के पसंदीदा व्यंजन:
पितरों को उनके पसंदीदा भोजन का भोग लगाएं।
पितृ दोष:
यदि पितृ दोष है, तो पितृ पूजा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
पितृ पक्ष:
पितृ पक्ष में पितृ पूजा का विशेष महत्व है।
ब्राह्मणों का सम्मान:
ब्राह्मणों को भोजन कराना और उनका सम्मान करना महत्वपूर्ण है।
दान:
दान करने से पितरों को शांति मिलती है।
यह ध्यान रखें कि पितृ पूजा श्रद्धा और भक्ति से की जानी चाहिए।
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अमावस्या कब है |23 अगस्त, 2025 को है।
23 अगस्त, 2025 को भाद्रपद अमावस्या है, जिसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है, mPanchang के अनुसार. इस दिन, लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और दान-पुण्य करते हैं.
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अमावस्या तिथि 23 अगस्त को शुरू होगी और 24 अगस्त को समाप्त होगी, लेकिन उदया तिथि के अनुसार, 23 अगस्त को अमावस्या मनाई जाएगी, एक ज्योतिष पंचांग के अनुसार.
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